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एक्ज़ीमा के प्रकार

एटोपिक डर्मेटिटिस: कई मामलों में यह जन्म के बाद के पहले साल में विकसित होता है, इस वजह से इसे शिशु संबंधी एक्ज़ीमा के नाम से भी जाना जाता है। एटोपिक डर्मेटिटिस के 90% मरीज़ों में इसके लक्षण पाँच साल से कम उम्र में ही देखे गए हैं। इन लक्षणों में आम तौर पर त्वचा में लाली, खुश्की या स्राव, कोहनी के मोड़ों पर, घुटनों के पीछे, गर्दन और चेहरे पर पपड़ीदार दाने निकलते दिखाई देते हैं। त्वचा बेहद शुष्क और खुजलीदार हो जाती है। ज्यादातर शिशु खुजलाहट को रोक नहीं पाते और बार-बार कुरेदने से उनमें अन्य प्रकार के संक्रमण भी हो जाते हैं।

आम तौर पर कई चीजों जैसे खान-पान की चीज़ों या पर्यावरण संबंधी एलर्जेन आदि के प्रति एलर्जिक प्रतिक्रिया इस तरह के एक्ज़ीमा का कारण बनती है (अधिक जानकारी के लिए एक्ज़ीमा के कारण देखें)। आनुवंशिकता और किसी प्रकार की एलर्जी, अस्थमा, हाय फ़ीवर आदि का पारिवारिक इतिहास भी एटोपिक डर्मेटिटिस के कुछ मामलों में स्पष्ट देखा जा सकता है। कई बार यह रोग अन्य एलर्जिक तथा अतिसंवेदनशील विकारों जैसे नासिका संबंधी रोग (रिनिटिस), अस्थमा (दमा) आदि के साथ भी होता है।

संपर्क जन्य डर्मेटिटिस: इस तरह का एक्ज़ीमा तब होता है जब त्वचा किसी एलर्जी वाली वस्तु (एलर्जिक संपर्क डर्मेटिटिस) या उत्तेजक (उत्तेजक संपर्क डर्मेटिटिस) के सीधे संपर्क में आती है। लंबे समय तक खान-पान और पर्यावरणीय कारक जैसे एलर्जेनों की मात्रा बढ़ाते जाने से आम तौर पर एक्ज़ीमा होने का ख़तरा बढ़ जाता है। हालांकि, कुछ समय तक एलर्जी पैदा करने वाले कारकों के संपर्क में रहने से भी एक्ज़ीमा के तेजी से फ़ैलने की संभावना बढ़ जाती है।

निकल (कृत्रिम आभूषणों में इस्तेमाल होने वाली धातु) के संपर्क में आने से होने वाली एलर्जी संपर्क संबंधी डर्मेटिटिस के सबसे आम रूपों में से एक है। चेन, घड़ी, अंगूठी, कान के झुमके या अन्य चीज़ें भी लाल और खुजली वाले चकत्ते बना देती हैं, जो आगे चलकर त्वचा पर छोटे-छोटे दाने या त्वचा से मवाद निकलने का कारण बनती हैं।

सेबोरेइक डर्मेटिटिस (रूसी): यह त्वचा रोग आम तौर पर सिर, माँग और कानों के पीछे के क्षेत्र को प्रभावित करता है, जिसमें लाल रंग के चकत्ते बन जाते हैं जिन पर हल्के पीले रंग की तैलीय पपड़ी जैसे लक्षण नज़र आते हैं। यह आम तौर पर तैलीय त्वचा और तैलीय खोपड़ी वाले लोगों में दिखता है, और इसमें मौसम के अनुसार बदलाव नज़र आता है।

एक्सफोलिएटिव डर्मेटिटिस: इस त्वचा रोग में रोगी के पूरे शरीर पर बड़े पैमाने पर शल्क और पपड़ी बन जाती जो लगभग पूरे शरीर को ढंक लेती है।

स्टेसिस डर्मेटिटिस:इस त्वचा रोग में एक्ज़ीमा शरीर के कमज़ोर रक्त प्रवाह वाले भागों जैसे घुटनों में होता है जो लंबे समय में फोड़े का रूप ले सकता है। मुख्य रूप से यह अन्य समस्याओं के साथ-साथ परिसंचरण तंत्र के विकारों जैसे वेरीकोस वेन से जुड़ा हुआ है जिसमें नसों में सूजन हो जाता है।

नम्युलर डर्मेटिटिस: नम्युलर डर्मेटिटिस में रोगी की त्वचा पर सिक्के के आकार का उभार देखा जा सकता है।

न्यूरो–डर्मेटिटिस: न्यूरो-डर्मेटिटिस भावनात्मक तनाव की वजह से विकसित होता है, जिसमें मरीज़ को त्वचा में काफी खुजलाहट महसूस होती है, ख़ास कर जब वह आराम या विश्राम कर रहा होता है। आम तौर पर खुजलाहट उसे कुरेदने पर मजबूर करती है और वह अधिक से अधिक कुरेदता जाता है। यह त्वचा रोग ख़ासकर उन क्षेत्रों तक सीमित होता है जहाँ व्यक्ति आसानी से खुजली कर सकता है — पैरों का निचला हिस्सा, घुटने, गर्दन के पीछे और बगल का हिस्सा, कलाइयां, बांहें और जननांग।

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