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सोरायसिस के प्रकार

सोरायसिस वल्गरिस: यह सोरायसिस के सबसे आम रूपों में से एक है, और इसे प्लैक सोरायसिस भी कहा जाता है। लगभग 10 में से 9 सोरायसिस रोगियों में देखा गया है। इसमें लाल, चांदी जैसी परत वाले उभरे हुए चकत्ते दिखाई देते हैं।

चित्तीदार सोरायसिस: छोटे, बारिश की बूँद की तरह के घाव धड़ और हाथ-पैरों पर विकसित हो सकते हैं। कई हफ्तों के गले के संक्रमण के बाद (विशेष रूप से स्ट्रेप्टोकोकल) यह रूप अचानक विकसित हो सकता है। यह आम तौर पर बच्चों में देखा जाता है।

फुंसीदार सोरायसिस: घावों में अन्य अलग विशेषताओं के अलावा मवाद भर जाते हैं। यदि मवाद से भरे घाव सारे शरीर में फैल जाते हैं तो यह बहुत खतरनाक हो सकता है, और इसके लिए तत्काल चिकित्सकीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी।

उल्टा सोरायसिस: इसमें त्वचा के मोड़ों में चमकदार लाल, चिकने चकत्ते देखे जाते हैं। प्रभावित होने वाले आम क्षेत्रों में स्तन के नीचे, कांख, जननांग क्षेत्र, कूल्हों के नीचे और पेट के मोड़ों के नीचे के भाग शामिल हैं।

एरिथ्रोडर्मिक सोरायसिस: यह सोरायसिस का एक दुर्लभ रूप है, और काफी गंभीर हो सकता है। मरीजों के अपने लगभग पूरे शरीर पर तीव्र लाली और पपड़ी बन जाती है जिसमें से काफी मात्रा में शल्क निकलते देखे जा सकते हैं। यह धुप में झुलसने, स्टेरॉयड के सेवन आदि से बढ़ सकता है। गंभीर मामलों में, रोगी के शरीर में पानी की कमी, बुखार और संक्रमण हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में भर्ती करनाने की जरूरत पड़ेगी।

नाखून का सोरायसिस: हाथ के नाखून और पैर के नाखून भी सोरायसिस से प्रभावित होते हैं। कई मामलों में इनमें फीकापन, मोटापन, गड्ढे और उभार दिखाई देते हैं, और वे नाखूनों के नीचे के आधार से उखड़ने या अलग होने लगते हैं।

खोपड़ी का सोरायसिस: त्वचा सोरायसिस की समस्या से पीड़ित लगभग आधे लोग खोपड़ी के सोरायसिस से प्रभावित होते हैं। ये खोपड़ी के हिस्सों में बहुत अधिक पपड़ीदार या परतदार प्लैक क्षेत्र बना देते हैं और खोपड़ी की त्वचा रूखी हो जाती है। प्लैक गुच्छों में निकलते या छिलके की तरह उतरते हैं।

सोरायटिक आर्थराइटिस: सोरायसिस से ग्रस्त रोगियों में लगभग 2 से 5% में उनके जोड़ प्रभावित होते हैं। लक्षणों में सूजन, अकड़न और प्रभावित जोड़ों में दर्द होना शामिल है। यह उन्नत चरणों में काफी गंभीर हो सकता है।

पामो-प्लान्टर सोरायसिस: आम तौर पर इस प्रकार के सोरायसिस के रोगियों की हथेलियों और तलवों पर घाव देखे जाते हैं।

 

शरीर के अन्य भागों पर सोरायसिस का प्रभाव

जोड़ : सोरायसिस 5 से 10 प्रतिशत रोगियों में जोड़ों की समस्याओं से जुड़ा होता है। वास्तव में, जोडों का दर्द कभी-कभी इस समस्या का एकमात्र संकेत हो सकता है, जहां त्वचा पूरी तरह से साफ रहती है। सोरायसिस से संबधित की जोड़ों की समस्या को सोरायटिक आर्थराइटिस के नाम से जाना जाता है। रोगियों के जोड़ों में सूजन हो सकती है, हालांकि हाथों, घुटनों और टखनों के जोड़ आम तौर पर अधिक प्रभावित होते हैं। यह आर्थराइटिस का एक विनाशक प्रकार है और इसका इलाज़ दवाइयों से होता है जिससे इस बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। सोरायटिक आर्थराइटिस की शुरुआत की औसत उम्र 30 से 40 साल के बीच होती है। आम तौर पर त्वचा के लक्षण आर्थराइटिस की शुरुआत के पूर्व दिखाई देते हैं।

नाखून : कु़छ रोगियों में सोरायसिस सिर्फ नाखूनों को प्रभावित करते हैं। आम तौर पर ये लक्षण त्वचा के संक्रमण और आर्थराइटिस के लक्षणों के साथ होते हैं। नाखूनों से संबंधित सोरायसिस का इलाज खास तौर पर बहुत कठिन होता है।

सोरायसिस के साथ जीवन

सोरायसिस के साथ जिंदगी बहुत कठिन हो सकती है। ऐसे कई हालात हो सकते हैं जिनमें सोरायसिस के मरीज़ों को परेशानी झेलनी पड़ सकती है, घावों के साथ-साथ इनको भी धैर्यपूर्वक प्रबंधित और ठीक करने की जरूरत होगी। खुजली, तनाव, प्रभावित भागों की विरूपता, सामाजिक जीवन, दाम्पत्य जीवन आदि अक्सर इस बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए भारी चिंता के क्षेत्र बन जाते हैं। कुछ सामान्य समस्याएं नीचे बतायी गयी हैं:

तनाव : तनाव सोरायसिस के तीव्रता से उत्पन्न होने का एक सामान्य कारण है। विडंबना यह है कि सोरायसिस की तीव्रता भी तनाव का कारण बन सकती है। नेशनल सोरायसिस फाउंडेशन के “मानसिक स्वास्थ्य अंक संक्षेप” के अनुसार सोरायसिस स्वतंत्र रूप से तनाव-संबंधी विकारों से जुड़ा हुआ है। ख़ास तौर पर महिलाएं सोरायसिस से होने वाले तनाव के प्रति संवेदनशील होती हैं। 

सूजन/जलन: यह तनाव से जूझने का शरीर का एक तरीका है। आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली जलन/सूजन पैदा करने वाले रसायन भेजकर चोट और संक्रमण का जवाब देती है जिससे घाव घाव भरने में मदद मिलती है। सोरायसिस के मरीज़ की प्रतिरक्षा प्रणाली की अत्यधिक तीव्र प्रतिक्रिया करती है जिसके कारण यह बहुत अधिक मात्रा में रसायन भेजती है। इससे तनाव को संभालना मरीज के लिए एक चुनौती बन जाती है। मेडिटेशन, व्यायाम और तनाव प्रबंधन की अन्य विधियां मानसिक तनाव से लड़ने में मदद करती हैं।

खुजली: सोरायसिस से उत्पन्न खुजली जीवनशैली पर भी गहरा असर डालती है। त्वचा को नम रखने से पपड़ियां और परतें बनने से रोका जा सकता है। ठंडे पानी से स्नान और शीतल पैक से भी राहत मिल सकती है।

संबंध: सोरायसिस की समस्या और अपने जीवन पर इसके प्रभाव के बारे में दोस्तों और परिवार से बात करना मुश्किल हो सकता है। यह एक प्रत्यक्ष बीमारी है जो कई तरीकों से रिश्तों को प्रभावित करती है। सोरायसिस के मरीज़ अपने शरीर की खराब छवि के कारण एक दूसरे से मिलने से भी कतराते हैं। जननांगों के सोरायसिस का यौन संबंधों और रिश्तों पर काफ़ी बुरा प्रभाव पड़़ता है। इस रोग से रोमांटिक संबंधों में बाधा पड़ सकती है। हालांकि, जननागों का सोरायसिस आम तौर पर यौन क्रिया में कोई बाधा नहीं डालता है।

निराशा/अवसाद:: सोरायसिस की समस्या से ग्रस्त लोगों के निराशा/अवसाद का शिकार होने की अधिक संभावना रहती है। ऐसा माना गया है कि अवसाद सोरायसिस के कारण होने वाली मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। सोरायसिस से पीड़ित रोगियों में अवसाद होने की संभावना आम लोगों की तुलना में दोगुनी होती है। चिकित्सकों का मानना है कि सोरायसिस का कारण बनने वाले शरीर के जैविक बदलाव भी अवसाद उत्पन्न करते हैं। सोरायसिस का प्रत्यक्ष रूप एक सामाजिक कलंक बन जाता है जिससे अवसाद होने की संभावना बढ़ जाती है।

कामकाज: सोराय और सोरायटिक आथर्रायटिस के साथ कामकाज करना भी एक बड़ी चुनौती हो सकती है। आपको चिकित्सकों से मिलने का समय लेने या अपने कार्यक्षेत्र में अनुकूल बदलाव लाने की जरूरत भी पड़ सकती है।

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